“लागा चुनरी में दाग,छिपाऊँ कैसे,घर जाऊँ कैसे?” जी हाँ| बीते ज़माने के गीतकार साहिर लुधियानवी जी के लिखे इन पंक्तियों को सामान्य अर्थ में समझा जाये तो यूँ लगता है की नायिका की चुनरी में दाग लग गयी है और वह इसे छिपाने और छिपाकर घर जाने के यत्नों के बारे में पूछ रही है|वह कुछ ज्यादा ही चिन्तित हो रही है इस दाग को लेकर परन्तु आज के दौर में इस प्रकार की चिंता को तो यूँ ही दरकिनार कर दिया जाता है|बात चाहे राजनीती की हो या खेल की या फिर कोई भी क्षेत्र हो,हर जगह “दागी” लोगों का ही बोलबाला दिख रहा है बल्कि आजकल तो हालात कुछ यूँ बन गए हैं कि बिना “दाग” के रौब नही| फर्क बस इतना है की किसी के “दाग” जनता के सामने प्रत्यक्ष रूप से प्रकट हो रहे हैं तो कोई बंद कमरों में “दागी” बन रहा है|कोई शक्ति प्राप्ति के पश्चात् “दागी” बन रहा है तो कोई “दागी” होने के बाद भी शक्ति प्राप्त कर रहा है|”दागी” होना तो आजकल एक फैशन सा बना गया है|हमारे देश को जहाँ पहले “सोने की चिड़िया” और “जगद्गुरू” आदि नामों से जाना जाता था तो वर्तमान में हमारी छवि एक घोटालेबाज और भ्रष्ट देश के रूप में दुनिया में प्रसिद्ध है|वर्ष 2014 की “एसोसिएशन ऑफ़ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स” नामक संस्था की रिपोर्ट के अनुसार,देश की दो सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी में औसतन 30 फीसदी सांसद ऐसे थे जिन पर क्रिमिनल केस पेंडिंग थे|वैसे आज़ादी के सडसठ बरस बीत जाने के बाद भी हमें कोई ऐसा मुखिया नहीं मिल पाया है जिसका दामन दागदार न हुआ हो|कुछेक जरुर मिल जायेंगे पाक साफ़,पर उनकी गिनती महज उँगलियों में ही है|अब इसे भारतीय राजनीती के ऊपर लगा कलंक कहें या फिर हम भारतीयों का दुर्भाग्य|नेहरु से लेकर वर्तमान में मोदी तक लगभग सभी प्रधानमंत्रियों के ऊपर दाग तो लगे ही हैं| |एक ज़माना हुआ करता था जबकि लोग आरोप लगने के साथ ही अपने पद से इस्तीफा दे देते थे|आज तो स्थिति और भी भयावह हो गयी है|विपक्ष “नैतिकता” के नाम पर इस्तीफा मांगने का कोई मौका गंवाना नहीं चाहता तो वही दूजी ओर सत्ता पक्ष के “दागी” भी अपनी नैतिकता गंगा नदी में विसर्जित कर आये हैं|मेरे विचार से,उन्हें उन विपक्षी नेताओं के बजाय जनता के लिए सोचना चाहिए कि उनके इस कदम से कैसा संदेश प्रसारित हो रहा आम लोगों बीच|इन सबसे इतर चुनावों में बातें तो बड़ी-बड़ी की जाती हैं|ऐसा प्रतीत होता है मानो यही नेता भारत माँ का सच्चा सपूत है|पर सत्ता प्राप्ति के साथ ही नेता जी के सुर ऐसे बदलते हैं जैसे गिरगिट रंग बदलता है|इन सबके बाद भी पूरी बेशर्मी के साथ बयानबाजी करते हैं और अपने को सबसे बड़ा राष्ट्रभक्त बताने में भी ऐसे लोगों को तनिक भी परहेज नहीं है|हालात तो आजकल यूँ हो गए हैं कि हमारे राष्ट्रभक्त नेता जिस भी क्षेत्र में हाथ आजमाते हैं,वहीँ से अभूतपूर्व तरीके से घोटाले उभरकर सामने आ जाते हैं और दामन मैला कर जाते हैं|फिर चाहे वो क्रिकेट हो या फिर कामनवेल्थ खेल या कुछ और|ऐसा नहीं है कि ऐसे “दागी” केवल राजनीती में ही हैं|देश में धर्म माना जाने वाला क्रिकेट का खेल भी इससे अछुता नहीं रहा है|1996 और 1999 के बीच फिक्सिंग के दाग ने उभरते खिलाडियों का जीवन बर्बाद करके रख दिया था और ये सिलसिला आज भी बदस्तूर ज़ारी है|आईपीएल में सामने आये फिक्सिंग के मामले इसके जीवित उदहारण हैं|एक ज़माने में क्रिकेट को “जेंटलमेंस गेम” कहा जाता था पर आज तस्वीर पूरी तरह उलट है|मैदान पर आक्रामकता के नाम पर जिस प्रकार स्लेजिंग और अभद्र इशारे किये जाते हैं,उसने इस खेल को दागदार बना दिया है|बहरहाल,लोगों के दामन मैले तो हो ही रहे हैं चाहे वो परदेस में बैठा ललित मोदी करे या देश में ही मौजूद “दामाद” | या फिर देश में ही मौजूद शाही संपत्ति या फिर “दिल” में मौजूद व्यापमं|
“स्वच्छ रहिये,स्वस्थ रहिये"
“भारत माता की जय|जय हिन्द|वन्दे मातरम्|”
“स्वच्छ रहिये,स्वस्थ रहिये"
“भारत माता की जय|जय हिन्द|वन्दे मातरम्|”
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