Monday, 3 August 2015

“दामन में दाग...हर किसी के है”

        “लागा चुनरी में दाग,छिपाऊँ कैसे,घर जाऊँ कैसे?” जी हाँ| बीते ज़माने के गीतकार साहिर लुधियानवी जी के लिखे इन पंक्तियों को सामान्य अर्थ में समझा जाये तो यूँ लगता है की नायिका की चुनरी में दाग लग गयी है और वह इसे छिपाने और छिपाकर घर जाने के यत्नों के बारे में पूछ रही है|वह कुछ ज्यादा ही चिन्तित हो रही है इस दाग को लेकर परन्तु आज के दौर में इस प्रकार की चिंता को तो यूँ ही दरकिनार कर दिया जाता है|बात चाहे राजनीती की हो या खेल की या फिर कोई भी क्षेत्र हो,हर जगह “दागी” लोगों का ही बोलबाला दिख रहा है बल्कि आजकल तो हालात कुछ यूँ बन गए हैं कि बिना “दाग” के रौब नही| फर्क बस इतना है की किसी के “दाग” जनता के सामने प्रत्यक्ष रूप से प्रकट हो रहे हैं तो कोई बंद कमरों में “दागी” बन रहा है|कोई शक्ति प्राप्ति के पश्चात् “दागी” बन रहा है तो कोई “दागी” होने के बाद भी शक्ति प्राप्त कर रहा है|”दागी” होना तो आजकल एक फैशन सा बना गया है|हमारे देश को जहाँ पहले “सोने की चिड़िया” और “जगद्गुरू” आदि नामों से जाना जाता था तो वर्तमान में हमारी छवि एक घोटालेबाज और भ्रष्ट देश के रूप में दुनिया में प्रसिद्ध है|वर्ष 2014 की “एसोसिएशन ऑफ़ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स” नामक संस्था की रिपोर्ट के अनुसार,देश की दो सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी में औसतन 30 फीसदी सांसद ऐसे थे जिन पर क्रिमिनल केस पेंडिंग थे|वैसे आज़ादी के सडसठ बरस बीत जाने के बाद भी हमें कोई ऐसा मुखिया नहीं मिल पाया है जिसका दामन दागदार न हुआ हो|कुछेक जरुर मिल जायेंगे पाक साफ़,पर उनकी गिनती महज उँगलियों में ही है|अब इसे भारतीय राजनीती के ऊपर लगा कलंक कहें या फिर हम भारतीयों का दुर्भाग्य|नेहरु से लेकर वर्तमान में मोदी तक लगभग सभी प्रधानमंत्रियों के ऊपर दाग तो लगे ही हैं| |एक ज़माना हुआ करता था जबकि लोग आरोप लगने के साथ ही अपने पद से इस्तीफा दे देते थे|आज तो स्थिति और भी भयावह हो गयी है|विपक्ष “नैतिकता” के नाम पर इस्तीफा मांगने का कोई मौका गंवाना नहीं चाहता तो वही दूजी ओर सत्ता पक्ष के “दागी” भी अपनी नैतिकता गंगा नदी में विसर्जित कर आये हैं|मेरे विचार से,उन्हें उन विपक्षी नेताओं के बजाय जनता के लिए सोचना चाहिए कि उनके इस कदम से कैसा संदेश प्रसारित हो रहा आम लोगों बीच|इन सबसे इतर चुनावों में बातें तो बड़ी-बड़ी की जाती हैं|ऐसा प्रतीत होता है मानो यही नेता भारत माँ का सच्चा सपूत है|पर सत्ता प्राप्ति के साथ ही नेता जी के सुर ऐसे बदलते हैं जैसे गिरगिट रंग बदलता है|इन सबके बाद भी पूरी बेशर्मी के साथ बयानबाजी करते हैं और अपने को सबसे बड़ा राष्ट्रभक्त बताने में भी ऐसे लोगों को तनिक भी परहेज नहीं है|हालात तो आजकल यूँ हो गए हैं कि हमारे राष्ट्रभक्त नेता जिस भी क्षेत्र में हाथ आजमाते हैं,वहीँ से अभूतपूर्व तरीके से घोटाले उभरकर सामने आ जाते हैं और दामन मैला कर जाते हैं|फिर चाहे वो क्रिकेट हो या फिर कामनवेल्थ खेल या कुछ और|ऐसा नहीं है कि ऐसे “दागी” केवल राजनीती में ही हैं|देश में धर्म माना जाने वाला क्रिकेट का खेल भी इससे अछुता नहीं रहा है|1996 और 1999 के बीच फिक्सिंग के दाग ने उभरते खिलाडियों का जीवन बर्बाद करके रख दिया था और ये सिलसिला आज भी बदस्तूर ज़ारी है|आईपीएल में सामने आये फिक्सिंग के मामले इसके जीवित उदहारण हैं|एक ज़माने में क्रिकेट को “जेंटलमेंस गेम” कहा जाता था पर आज तस्वीर पूरी तरह उलट है|मैदान पर आक्रामकता के नाम पर जिस प्रकार स्लेजिंग और अभद्र इशारे किये जाते हैं,उसने इस खेल को दागदार बना दिया है|बहरहाल,लोगों के दामन मैले तो हो ही रहे हैं चाहे वो परदेस में बैठा ललित मोदी करे या देश में ही मौजूद “दामाद” | या फिर देश में ही मौजूद शाही संपत्ति या फिर “दिल” में मौजूद व्यापमं|
                                     “स्वच्छ रहिये,स्वस्थ रहिये" 
                        “भारत माता की जय|जय हिन्द|वन्दे मातरम्|”

Sunday, 19 July 2015

“बजरंगी भाईजान:सोच से परे और उम्मीद से कहीं बेहतर”

      जी हाँ|बात हो रही है “बजरंगी भाईजान” की|एक ऐसी फिल्म जिसकी शायद कोई कल्पना भी नहीं कर सकता|एक मूक पाकिस्तानी बच्ची,एक नवयुवक “हनुमान” भक्त और एक जिंदादिल पत्रकार,इन तीनों के इर्द-गिर्द घुमती हुई इस फिल्म की पटकथा बहुत ही बेहतरीन ढंग से लिखी गयी है|दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों के दृश्य तो सामान्यतया हरेक फिल्म में दिख जाते हैं लेकिन कश्मीर और उसके आसपास के इलाकों का जिस तरह से फिल्मांकन किया गया है,वह अद्भुत है| “धरती के स्वर्ग” कश्मीर की खूबसूरती इस फिल्म में पूर्ण रूप से निखर कर सामने आई है या यूँ कहा जाये की सामने लायी गयी है|वैसे वर्तमान समय में जब चारों ओर इस बात की दौड़ लगी है कि किसकी फिल्म ज्यादा कमाई कर रही है,इस प्रकार की फिल्मों का परदे पर आना एक सुखद एहसास देता है|फिल्म को रुपहले परदे पर आये आज तीन दिन हो गए हैं,लिहाजा कहानी तो सबको पता चल ही गयी है|व्यावसायिक सिनेमा और प्रतिस्पर्धा के इस दौर में इस प्रकार की फिल्में समाज को एक सही दिशा प्रदान कर सकती हैं|एक ना बोल सकने वाली बच्ची,जिंदगी की जद्दोजहद में फँसा हुआ एक युवक और एक अंजान मुल्क,इन तीनों के संयोग से फिल्म की कहानी बेहतर बनती है|एक ऐसी कहानी जिसका सच होना इस देश में वास्तव में बहुत ही असंभव है|अरे!!!कौन है इस देश में जो फिल्म के “बजरंगी” की तरह ही बच्ची की मदद करेगा और उसे उसके परिवार से मिलाने के लिए अपनी जान खतरे में डालकर एक अंजान मुल्क में जायेगा|भगवान बजरंगबली के भक्त तो हजारों मिल जायेंगे पर उनमे से किसी का भी आचरण “बजरंगी” से तनिक भी मेल नहीं खायेगा|वस्तुतः आज तो स्थिति यह हो गयी है कि एक समय के बाद लोग अपने माता-पिता को ही अकेला छोड़ देते हैं,समय आने पर अपने परिवार से ही मूंह फेर लेते हैं तो फिर एक “अपरिचित” के लिए कौन इतना जोखिम उठायेगा|पर वास्तव में इस फिल्म के कहानीकार का कार्य सराहनीय है जिन्होंने आज के इस परिदृश्य में भी इस तरह की भावनात्मक,मानवतावादी और सकारात्मक लेखन का उत्कृष्ट प्रयास किया है और इसी की वजह से ही यह फिल्म और भी अच्छी लग पड़ती है|वैसे रिलीज़ से पहले इस फिल्म के साथ विवादों को भी जोड़ने की काफ़ी साज़िश की गयी थी|कुछ लोगों को फिल्म के नाम से तकलीफ हो रही थी पर सिनेमाघरों में आने के बाद जहाँ इस फिल्म ने अपने शीर्षक को चरितार्थ किया है वहीँ धर्म के तमाम ठेकेदारों के गाल पर करारा तमाचा जड़ा है|इस फिल्म के जरिये यह सन्देश देने का भी बखूबी प्रयास किया गया है कि “मानव-मात्र” की सेवा और सहायता करना ही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है|
        खैर,इस फिल्म को बहुत ही बेहतरीन तरीके से बनाया गया है और फिल्म से जुड़े सभी लोगों की इसके लिए सराहना की जानी चाहिए| कहा जाता है, “सिनेमा,समाज का आइना होता है”,पर हम यही उम्मीद करते हैं कि यह फिल्म सारे समाज को एक आइना दिखाए और जिस उद्देश्य को ध्यान में रखकर फिल्म बनायीं गयी है,यह उसमे सफल भी हो|मैंने तो देख लिया,अब आप भी देख ही आइये|

                          “जय श्री राम”
                     "स्वच्छ रहिये,स्वस्थ रहिये"
              “भारत माता की जय|जय हिन्द|वन्दे मातरम्|”

Monday, 13 July 2015

“मेरे मन की बात”

जीवन के इस उलझन में,ना जाने किस ओर जाना है|
साधारण सा जीवन जीना है,या कुछ अद्भुत करके मर जाना है|
अलग-अलग सब पथ बतलाते,अंततः हमें ही तो उस पर चलना है|
कुछ कर लें अब देश की खातिर,क्योंकि आज नहीं तो कल मरना है|
सोचता हूँ मन में कभी,अपने देश को “बुराइयों” से आज़ाद करा दूँ|
भारत माँ का सम्मान वापस लाकर,देश को पुनः “जगद्गुरु” बना दूँ|
सोचता हूँ मैं तो “युवा” हूँ,एक नयी क्रांति का आगाज़ करूं|
“वायु” के वेग से बहकर,देश-प्रेम का संचार करूं|
पर इस भ्रष्ट व्यवस्था के सम्मुख,मैं असहाय सा हो जाता हूँ|
जन-कल्याण की भावना है मन में,पर कुछ भी नहीं कर पाता हूँ|
अनुभव की कमी की दुहाई दे,मुझे पीछे कर दिया जाता है|
और जिनके लिए पैसा ही सब कुछ है,देश को उन्हीं के हाथों में धकेला जाता है|
“कालिख” पुते हुए चेहरे हैं,दामन में भी हजारों “दाग” हैं|
देश-प्रेम में ज़हर घोलते,ये ही वो “कालिया नाग” हैं|
मत भूलो तुम देश के आकाओं,घमंड ना किसी का रह पाया है|
भारत माँ को लज्जित करने वाले,सभी को “संतानों” ने सबक सिखाया है|
मजबूर हूँ मैं इस व्यवस्था के आगे,मुझे आपका साथ चाहिए|
देश की प्रगति और पुनरुद्धार के लिए,जनता का विश्वास चाहिए|
आओ मिलकर कदम बढ़ाएं,देश-प्रेम का अटूट भाव जगायें|
एक स्वच्छ सुशासन देकर,भारत माँ का मान बढायें|

                            “स्वच्छ रहिये,स्वस्थ रहिये”
             “भारत माता की जय|जय हिन्द|वन्दे मातरम्|”

Sunday, 5 July 2015

"बारिश:कहीं राहत कहीं आफत"

     बारिश!!! एक ऐसा प्राकृतिक घटनाचक्र जिसका शायद हर किसी को बेसब्री से इंतजार रहता है|गर्मी के तपते मौसम और लगातार चढ़ते हुए पारे के बीच यदि कही कोई बारिश की हल्की सी भी फुहार आ जाये तो उस अनुभव को शब्दों में बयां कर पाना तनिक मुश्किल है|ऐसा लगता है मानो जल बिन तडपती मछली को लबालब पानी से भरे तालाब में छोड़ दिया गया हो|वर्तमान में प्रत्येक भारतीय जो इस देश में मौजूद है,इसी सुख का अनुभव कर रहे है|मानसून ने उसके लिए किये गए पूर्वानुमानो को धता बताते हुए निर्धारित तिथि के दो दिन बाद देश में प्रवेश किया|इस खबर से ही लोगो को राहत महसूस हुई और वे ज्यादा बेसब्री से इसका इंतजार करने लगे|जानकारों ने बताया कि इस बार मानसून औसत से कम रहने वाला है लेकिन मानसून के आगमन के बाद के आंकडों पर गौर करें तो ये भविष्यवाणी बेईमानी लगती है|आकाश में छाये काले बदरा जिस तरह से बरसे हैं,उसने मौसम पंडितो को फिर से विचार करने पर मजबूर तो किया ही है|इस पहली बारिश से जहाँ एक वर्ग बहुत ही उत्साहित और राहत महसूस कर रहा है तो कुछ लोगों के लिए यही बारिश आफत भी ले कर आई|उत्तर से दक्षिण हो या पूर्व से पश्चिम,देश के हर कोने में ये बादल ऐसे बरसे कि जून माह के लिए तय आंकड़ों से 28% अधिक बारिश रिकॉर्ड की गयी|जहाँ इस बारिश से लोगों को भयंकर गर्मी से निजात मिली,सुकून की साँसे फिर से हलक में लौट आयीं,वही दूसरी ओर कृषक वर्ग भी इस प्रकार की बारिश को लेकर बहुत आनंदित हुआ|देश के “अन्नदाता" ने अपना कार्य आरम्भ कर दिया है|देखा जाए तो आज की तारीख में सही मायनों में वे ही “मेक इन इंडिया” कर रहे हैं और भगवान भी इसमें लगातार उनका ही साथ दे रहे हैं|ये बात अलग है कि इन अन्नदाताओं की अहमियत सरकार के लिए उतनी है नहीं जितनी होनी चाहिए|इसका कारण भी है|इस देश में “कृषक” वर्ग ही एकमात्र वर्ग है जो कि उत्पादन स्वयं करता है परन्तु उसके उत्पाद का मूल्य निर्धारण कोई और ही करता है|खैर,इस बारिश ने जहाँ एक ओर लोगों को सुखद एहसास तो कराया ही,वहीँ दूजी ओर सरकार की सारी तैयारियों की पोल खोल दी|जम्मू-कश्मीर हो या पूर्वोत्तर के राज्य,गुजरात हो या महाराष्ट्र,अधिकांश जगहों पर बाढ़ के हालात बन गये हैं|देश की आर्थिक राजधानी मुंबई तो इस पहली बारिश में ही हाल बेहाल हो गयी|घुटनों तक भरे हुए पानी ने पूरे शहर को रोक कर रख दिया|जिन नालियों की सफाई पर बी.एम.सी. ने करोड़ों फूंक डाले,वे ही दगा दे गयी और मुंबई शहर एक टापू सा बन गया|आनन-फानन में सरकार को लोगों से अपील करनी पड़ी कि बहुत जरुरी होने पर ही घर से बाहर निकले|सारी योजनाओं का बंटाधार हो गया|जिस गुजरात के “विकास मॉडल” के चलते मोदी जी प्रधानमंत्री बने है,वहां भी बाढ़ के कमोबेश वही नज़ारे देखे गए जैसा की मुंबई में|आलम तो कुछ यूँ रहा कि जब बात की गयी जिम्मेदार लोगों से तो उनके बयान सुनकर तो हंसी के फव्वारे फूट पड़े|किसी ने कहा कि दस दिनों की बारिश एक दिन में हो गयी,इसलिए ये हालत बने|कोई तो घर में घुसे पानी के स्तर को लेकर बयान देते दिखे कि असल में पानी की गहराई 1 फीट ही थी,न की 3 फीट|वास्तव में,ये तो महज पहली ही बारिश थी और वो भी तब जबकि बादल अपने पूरे “फॉर्म” में नहीं थे|हालात इससे और भी बदतर हो सकते हैं|इसी प्रकार की ही कई मूलभूत समस्याएं हैं जिन्हें अगर चिन्हित करके प्रभावी ढंग से उनका समाधान खोजा जाये तो सारे शहर अपने आप ही “स्मार्ट” हो जायेंगे|तब शायद “स्मार्ट सिटी’ की जरुरत ही ना पड़े|
        खैर,ये बरसात का मौसम है|बीमारियाँ भी लाता है|सावधानी बरतते हुए बारिश का मजा लीजिये|सरकारी निर्देशों का भी पालन जरुर करिए|और हाँ,पकोड़े-चटनी का लुत्फ़ लेने में बिल्कुल भी मत शर्माइये|
“स्वच्छ रहिये,स्वस्थ रहिये’
“भारत माता की जय|जय हिन्द|वन्दे मातरम्|”

Sunday, 28 June 2015

"ज़िन्दगी"

ज़िन्दगी,
क्या है?
एक अविरल संघर्ष
या फिर एक अबूझ पहेली?
सवालों से घिरा हुआ हूँ मैं,
कोई इन प्रश्नों का उत्तर नहीं दे रहा है |
मन में सोचता हूँ,
अगर ज़िन्दगी संघर्ष है,
तो किसके साथ है ये संघर्ष ?
इस संघर्ष का आखिर कोई परिणाम तो होगा?
जीत किसकी होती है?
क्या मृत्यु को इस संघर्ष में वीरगति माना जाए !!!
या फिर उसे एक हार की भांति स्वीकार किया जाये?
फिर सोचता हूँ,
ज़िन्दगी गर एक पहेली है तो,
इसका कोई तो हल होगा |
जटिलताएं होंगी बहुत ही ज्यादा,
पर कभी तो ये सरल होगा,
अंततः
एक विचार मन में कौंधा |
ज़िन्दगी तो एक वरदान है,
सेवा और समर्पण जिसने किया,
मरने पर उसी का सम्मान है |
और यही,
इस ज़िन्दगी का सबसे बड़ा इनाम है |

"भारत माता की जय | जय हिन्द | वन्दे मातरम |"